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सागर पार भारतीय क्रांत के पहले प्रचारक
 
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के श्यामजी क्रष्ण वर्मा ऐसे प्रचारक जिन्होने सर्वप्रथम सागर पार जाकर भारतीय क्रांति की मशाल जलायी। श्यामजी क्रष्ण वर्मा का जन्म जन्मजातता अक्टूबर 1857 को काठियाव

By अजय मितल (राष्ट्रद




भारत के स्वतंत्रता संग्राम के श्यामजी क्रष्ण वर्मा ऐसे प्रचारक जिन्होने सर्वप्रथम सागर पार जाकर भारतीय क्रांति की मशाल जलायी। श्यामजी क्रष्ण वर्मा का जन्म जन्मजातता अक्टूबर 1857 को काठियावड़ प्रान्त के माण्ड्वी नगर मे हुआ था। सामान्य परिवार मे उत्पन्न होने पर भी अपनी प्रतिभा के अल पर श्यामजी का विवाग बम्बई के एक करोड़पति सेठ की पुत्री भानुमति के साथ हुआ।

मुम्बई मे एक बार महर्षि दयानन्द सरस्वती आये। उनके विचारो से प्रभावित होकर श्यामजी ने भारत मे संस्क्रत भाषा एंव वैदिक वुचारो के प्रचार का संकल्प लिया। ब्रिटिश विद्धान प्रोफ़ेसर विलियम उन दिनो संस्क्रत-अंग्रेजी शब्दकोष बना रहे थे। श्याम्जि ने उनकी बहुत सहायता की। इससे प्रभावित होकर प्रोफ़ेसर विलियम्स ने उन्हे ब्रिटेन आने का निमंत्रण दिया। वहाँ श्यामजी आक्सफ़ोड विश्र्वविघालय मे संस्क्रत के अध्यापक नियुक्त हुए, साथ ही स्वतंत्र रुप से उन्होने वेदो का प्रचार भी जारी रखा।

वे प्रथम भारतीय थे, जिन्होने आक्सफ़ोड विश्र्वविघालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। आपने उसी विश्र्वविघालय से सर्वप्रथम बैरिस्टरी परीक्षा भी उतीर्ण की। विलायत मे हर्बर्ट स्पेन्सर जैसे दार्शनिको के साथ श्यामजी क्रष्ण वर्मा का सम्पर्क स्थापित हुआ। संस्क्रत के प्रसिद्ध विद्धान मैक्समूलर भी श्यामजी क्रष्ण वर्मा की विद्धता का लोहा मानते थे।

सन 1885 मे जब बैरिस्टर बनकर श्यामजी क्रष्ण वर्मा भारत लौटे, तो उनकी प्रतिभा से आक्रष्ट होकर कई भारतीय रियासतो ने अपने यहाँ बुलाना चाहा। 10 नवम्बर 1886 से 1888 तक श्यामजी रतलाम रियासत मे दीवान के पद पर कार्य करते रहे। इस बीच उन्होने रियासत की बहुत उन्नति की। उनकी प्रतिभा से प्रभाविय होकर राजस्थान की उदयपुर रियासत के प्रसिद्ध शासक श्री फ़तह सिंह जी ने उन्हे अपने राज्य मे मंत्री पद नियुक्त कर दिया।

भारत मे अंग्रेजो के चढ़ते अत्याचारो से श्यामजी के मन पर तीव्र प्रतिक्रिया हुई, और उन्होने नौकरी छोड-छाडकर क्रांति योजनाओ का संचालन अपने हाथ मे लिया। भारत मे होने वाले विसफ़ोटो से श्यामजी क्रष्ण वर्मा घनिष्ठ सम्बन्ध रहता था। अपनी स्थिति भारत मे सुरक्षित न देखकर वे लन्दन जा पहुँचे। ब्रिटिश जासूस उन्हे भारत मे खोज रहे थे। और वे लंदन मे बैठकर भारतीय क्रांति का संचालन कर रहे थे। भारतीय क्रांति-दर्शन को व्यापक रुप प्रदान करने के लिए और वे विश्र्व मे उसे सम्मानीय स्थान दिलाने के लिये और श्यामजी क्रष्ण वर्मा ने लंदन से एक अगेजी मासिक पत्रिका ‘इण्डियन सोशियालाँजिस्ट’ नाम से निकालनी प्रारम्भ की, जिसके दार्शनिक आवरण मे क्रांति का प्रचार किया जा रहा था और संसार मे उन्होने लिखा-मनुष्य की स्वतंत्रता सबसे बढ़ी बात है बाकी सब बाद मे। उनके विचारो से प्रभाविक होकर मादाम भीकाजी कामा उनके साथ सक्रिय हो गये। लाला लाजपत राय, विपिनचन्द्र पाल आदि भी वहाँ आने लगे।

केवल पत्रिका के प्रकाश से ही श्यामजी को संतोष हुआ। उन्होने ज्वलंत भावनओ के चेतनाशील नवयुवक चाहिये थे, जो लंदन मे क्रांति की दीक्षा लेकर भारत मे सफ़ल क्रांति का संचालन करते।  

 

(राष्ट्रदेव)

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